1 दिसम्बर 2016 के दैनिक जागरण के अभिनव पृष्ठ पर मेरी इस ग़ज़ल को स्थान मिला। आदरणीय नवनीत जी की मुहब्बत मिली तो मेरी यह कोशिश सफ़ल हुई
न तो झूट मैंने कहा कभी न ही सच का साथ निभा सका
मेरी हार का है सबब कि मैं तेरी हाँ में हाँ न मिला सका
मैं था जिसका अरसे से मुन्तज़िर वो मिला हो जैसे इक अजनबी
न तो बात उस से हुई कोई न गले उसे मैं लगा सका
कभी पढ़ के इन को मैं रो लिया कभी रख के सीने पे सो लिया
न ये चिट्ठियां मैं जला सका न किसी नदी में बहा सका
न बयान उन से हुआ कभी न ही दर्द दिल का छिपा कभी
न रुमाल उन को दिखा सका न ही अश्क उन से छिपा सका
थी बनाई मैंने भी कश्तियां तेरे साथ जीने के ख्वाब की
जो बढ़ा गयीं मेरी तिश्नगी मैं वो बारिशें न भुला सका
ये हरे शजर हों कि बदलियाँ वो नदी वो बर्फ पहाड़ पर
हैं तुम्हारी लिक्खी इबारतें कोई पढ़ सका न मिटा सका
Saturday, 11 June 2016
तेरी हाँ में हाँ न मिला सका
Tuesday, 1 March 2016
इज़्तिराबी अज़ाब की सी है
लफ्ज़ पोर्टल की 28वीं तरही में मेरी कोशिश हज़रते मीर तक़ी 'मीर' के मिसरे पर
इज़्तिराबी अज़ाब की सी है
उन से दूरी सराब की सी है
शायरी बिन तेरे तस्सव्वुर के
ख़ाली बोतल शराब की सी है
लब झिझकते हैं उसको छूने में
“पंखुड़ी इक ग़ुलाब की सी है”
सादगी से सजी तेरी सूरत
इक ग़ज़ल की किताब की सी है
ज़िन्दगी में कमी है लम्हों की
डायरी घर-हिसाब की सी है
उस इमारत की नींव में पीपल
इब्तिदा इंक़लाब की सी है
सिर्फ़ दीदार से नहीं भरता
दिल की फ़ितरत नवाब की सी है
Wednesday, 10 February 2016
हज़ल
हज़ल
सरे राह बारिश में छाता उड़ा कर तेरा भीग जाना गज़ब हो गया
जो होली के दिन भी नहीं थी नहाती तेरा कल नहाना गज़ब हो गया
तेरे सुर्ख़ होंठों पे ये मुस्कुराहट, नज़रबट्टुओं की हो जैसे बनावट
लहू पी के आई हो जैसे कहीं से, तेरा पान खाना गज़ब हो गया
खुली ज़ुल्फ़ है या हैं काली घटायें, जुओं का क़बीला तुझे दे दुआयें
ऐ मेरे मोहल्ले की सन्नी लियोनी, तेरा सर खुजाना गज़ब हो गया
वही क़ाफ़िये हैं वही ज़ाविये हैं, ज़मीनें हमारी क़िले आपके हैं
हमारी ग़ज़ल ही का मक़्ता बदल के हमीं को सुनाना गज़ब हो गया
मुहब्बत की बारिश का कैसा असर है, जिसे भी मैं देखूँ वही तर-ब-तर है
बुढ़ापे की दहलीज़ पर ऐसे-ऐसे मेरा गुल खिलाना गज़ब हो गया
Friday, 25 December 2015
छिपाके यार तबस्सुम में बेक़रारी रख
लफ्ज़ पोर्टल की 27वीं तरही में एक प्रयास
ऐ दिल हमारे बस इक इल्तिजा हमारी रख
ये राज़ राज़ रहे थोड़ी होशियारी रख
इन आसुंओं पे लगा बाँध टूट जाने दे
बहा दे बोझ ऐ दिल! यूँ न ख़ुद को भारी रख
ज़रा तो सब्र से ले काम चाँद आने तक
“छिपाके यार तबस्सुम में बेक़रारी रख”
तिरे लिये ही तो आया हूँ मयकदे में फिर
दिले-मरीज़ मेरी लाज अब की बारी रख
‘नहीं-नहीं’ वो लिखें गर तो हाँ समझ लेना
हिसाब में ये मुहब्बत के जानकारी रख
ये राह आम नहीं है गली मुहब्बत की
ज़रा संभाल के ये उम्र की सवारी रख
कुछ एक पल की मुलाकात में धड़कना क्या?
तबाह दिल मेरे इतनी तो इन्किसारी रख
ये फूल चीड़* के जंगल में अब नहीं मिलते
‘नकुल’ सँभाल के बचपन की याद प्यारी रख
Sunday, 30 August 2015
झरने का साज़ जैसे घटा में लगा रहा
लफ्ज़ पोर्टल की 25वीं तरही में मेरी कोशिश
झरने का साज़ जैसे घटा में लगा रहा
पर्दे में चाँद शर्मो-हया में लगा रहा
मालूम था मुझे कि मुहब्बत क़ुसूर है
दिल फिर भी इस हसीन ख़ता में लगा रहा
सुनता रहा जो उसकी कहानी मैं रात भर
अपने अकेलेपन की दवा में लगा रहा
शब भर सता रहा था धुंआ कल सिगार का
सूरत बनाने तेरी हवा में लगा रहा
फुटपाथ सो गया था सजा कर थकावटें
बिस्तर पे बंग्ला डेढ़-सवा में लगा रहा
रस्ते में जो मिला था उसे अपना मान कर
मिट्टी का इक खिलौना, अना में लगा रहा
खेतों में फिर से काकभगोड़े उदास हैं
मौसम बदल बदल के जफ़ा में लगा रहा
नाराज़ मौसमों को बुलाता रहा किसान
‘मैं उस के साथ साथ दुआ में लगा रहा’
मैं खींचता इसे, ये कभी खींचता मुझे
रिक्शा सा ज़िन्दगी का ख़ला में लगा रहा
Saturday, 4 July 2015
मुक़ाबले में फिर से हार हो गयी पगार की
लफ्ज़ पोर्टल की २४वीं तरही में मेरी कोशिश
मुक़ाबले में फिर से हार हो गयी पगार की
दिहाड़ियां ग़ुलाम हो के रह गयीं उधार की
जवान उस ग़रीब की हुई हैं जब से बेटियां
पड़ी है भारी ‘सौ लुहार की’ पे ‘इक सुनार की’
उस ऊंघती गली में दफ़अतन वो उनसे सामना
“ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”
सज़ा में है मिली हमें ये बेवफ़ाई दोस्तो
ख़ता वफ़ा की आदतन जो हमने बार-बार की
दुआ-सलाम, हाल-चाल पूछना तो छोड़िये,
अब उनकी इक झलक भी बात है कभी-कभार की
पहाड़ छोड़ कर ज़ुबान शह्र की तो हो गयी,
है रूह में महक मगर अभी भी देवदार की
इमारतों के मौसमों में बाग़बाँ भी क्या करे?
लगा रहा है बेबसी में क़ीमतें बहार की
घड़ी भी थक के रुक चुकी है, राह भी है सो गयी
कटेगी कैसे अब ‘नकुल’ घड़ी ये इंतज़ार की
Saturday, 25 April 2015
ये ज़ख्मे दिल है इसकी दवाई हुई तो है
लफ्ज़ पोर्टल की 23वीं तरही में मेरी एक कोशिश
ग़ज़ल...
बंजर पड़ी ज़मीं की नपाई हुई तो है
उम्मीद काग़ज़ों ने बढ़ाई हुई तो है
फिर से मुआवज़े की कहीं घोषणा हुई
अफवाह फिर किसी ने उड़ाई हुई तो है
नारे चुनाव के वो दीवारों पे लिख गए
बस्ती में इस बहाने पुताई हुई तो है
हम भी हुए थे भीड़ में शामिल चुनाव की,
भर पेट खा लिया है कमाई हुई तो है
राई का जो पहाड़ बनाते थे मिल के रोज़
आख़िर उन आईनों की सफाई हुई तो है
अच्छा अगर बहुत हो तो होता है कुछ बुरा,
दिल्ली ने “आप” बीती सुनाई हुई तो है
दो खेत बेच कर है मिला फ्लैट शहर में
छत चू रही? है देखो चिनाई हुई तो है
बादल घिरे हुए हैं कि जंगल में आग है
काली घटा पहाड़ पे छाई हुई तो है
सूखे के बाद बाढ़ में डूबी हुई फ़सल
कीमत विकास की ये चुकाई हुई तो है
मौसम की करवटों से उठा है यही सवाल
कुदरत की वाट हमने लगाई हुई तो है
उस बाँध में डूबा है मेरा खेत भी कहीं
बिजली ये शहर की भी चुराई हुई तो है
फिर से नयी हुई है, रफ़ूगर! क़माल है
ऐसे क़मीज़ पर ये कढ़ाई हुई तो है
मैं शायरी में भूल गया हूँ इसे 'नकुल'
“ये ज़ख्मे दिल है इसकी दवाई हुई तो है”
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