Saturday, 6 June 2026

ग़ज़ल - जब से उस्ताद हो गये हैं आप

 जब से उस्ताद हो गये हैं आप

सिर्फ नक्काद हो गए हैं आप


इतने बेफिक्र, इतने बेपरवाह 

सच कहूँ, शाद हो गए हैं आप


बंद रहते हैं एक कमरे में

कितने आज़ाद हो गए हैं आप


भूले बिसरे, कभी-कभी आना

जैसे इक याद हो गए हैं आप


क्या ज़माना था जब थे तुम मेरे

आज के बाद हो गए हैं आप


क्या कहा, चाय छोड़ दी? सच में?

हाय! बर्बाद हो गए हैं आप


जो कभी हो नहीं सके पूरी

कोई फ़रियाद हो गए हैं आप


नकुल गौतम