Saturday, 7 June 2025

इश्क़ में पड़ गए हबाबों के

 हम जो आदी हुए अज़ाबों के

इश्क़ में पड़ गए हबाबों के


फूल भी फोन के कवर में हैं

अब ज़माने नहीं किताबों के


हमने पूछे नहीं सवाल अब तक

हैं मगर आस में जवाबों के


तेरी जुल्फों को छू न पाए जो,

पूछिए दर्द उन गुलाबों के


मेरा किरदार खो गया शायद

दरमियां खुश फ़हम निसाबों के


हाथ छलनी हैं साँस भारी है

हम तलबगार हैं गुलाबों के


क्या ही दरियाओं का करेंगे हम

हम जो शौक़ीन हैं सराबों के


 तुम न लौटोगे जानते हैं हम

मुन्तज़िर हैं तुम्हारे ख्वाबों के


नकुल

Monday, 17 March 2025

ग़ज़ल - मुझको मेरे फ़र्ज़ ने ज़िन्दा रक्खा है

 मुझको मेरे फ़र्ज़ ने ज़िन्दा रक्खा है

साफ़ कहें तो क़र्ज़ ने ज़िन्दा रक्खा है


सब कहते हैं इश्क़ बुरी है बीमारी

मुझको तो इस मर्ज़ ने ज़िन्दा रक्खा है


गा कर उसने इक दिन शेर सुनाया था

मुझको उस की तर्ज़ ने ज़िन्दा रक्खा है


 चाहत की फेहरिस्तें ख़त्म नहीं होती

यार! दिले ख़ुदग़र्ज़ ने ज़िन्दा रक्खा है


उसने मुझको चाय पिलाई थी इक दिन

बाकी खाते दर्ज़ ने ज़िन्दा रक्खा है

Sunday, 16 March 2025

क़ता - चाय


मेरी उम्मीद उसने तोड़ दी है

कहानी बीच में ही मोड़ दी है

मुलाकातें नहीं होती अब उनसे

सो हमने चाय पीना छोड़ दी है

Friday, 22 November 2024

हवा सलीके से चल रही है - ग़ज़ल

 



हवा सलीके से चल रही है, हर एक पत्ता संभल रहा है

तुम्हारी खिड़की खुली हुई है मिज़ाज मौसम बदल रहा है


हसीन वादी, सबा सुहानी, महक रही है ये रात-रानी, 

ये शाम यूं ही नहीं थमी है,  तुम्हारा ही कुछ दखल रहा है


पियालियाँ लड़खड़ा रही हैं सुराहियों की हैं आँखें बोझिल

बहक रहा है खुशी में साक़ी  ये मैकदा भी मचल रहा है


हर एक गुल मुस्कुरा रहा है सजी हुई है हर एक क्यारी

शजर अदब से झुके हैं चंदा बरामदे में टहल रहा है


तुम्हारे आने पे सकपका कर वो बड़बड़ाने लगा है कुछ कुछ

तुम्हारे आशिक़ को अंजुमन में तुम्हारा होना ही खल रहा है


तुम्हारे कानों की बालियों से फिसल के किरणें बिखर रही हैं

इसी नज़ारे में खोये सूरज का डूब जाना भी टल रहा है


हर एक चर्चा तुम्हारा चर्चा तुम्ही ग़ज़ल हो तुम्ही तसव्वुर 

हमारा होना भी धीरे धीरे तुम्हारे होने में ढल रहा है


हमारी ग़ज़लों की डायरी में तुम्हारा ही ज़िक्र है मुसलसल 

इसी से दिल भी बहल रहा है इसी से खर्चा भी चल रहा है




Friday, 10 December 2021

कहीं बेचैन से दीपक कहीं हैं सिरफिरे दीपक

 


कहीं बेचैन से दीपक कहीं हैं सिरफिरे दीपक

किसी ज़िद्दी से आशिक़ की तरह शब भर जले दीपक


मुखालिफ़ हैं बुराई के सभी घर-घर डटे दीपक

"उजाले के मुहाफ़िज़ हैं, तिमिर से लड़ रहे दीपक"


है मिट्टी ही मगर गुज़री है कूज़ागर के हाथों से

कोई मूरत हुई तेरी तो कुछ से बन गए दीपक


न अंधेरे में शिद्दत है न परवाने जुनूनी हैं

भला किसके लिये अब इन हवाओं से लड़े दीपक


है दीवाली बहाना शहर से बच्चों के आने का

सजा रक्खे हैं नानी ने कई छोटे बड़े दीपक


हुई मुद्दत की शब भर घी पिलाती थी इन्हें अम्मा

लगें बीमार अब झालर की रौनक से दबे दीपक


किसी शाइर के मन में रात दिन पकते खयालों से

किसी को रौशनी देंगे ये भट्ठी में पके दीपक


भरे बाज़ार थे हर सू फिरंगी लालटेनों से

दिलेरी से पुराने चौक पर मुस्तैद थे दीपक









Wednesday, 1 December 2021

जमी घास पर दोपहर तक है शबनम

 

जमी घास पर दोपहर तक है शबनम

कोई कर गया आँच सूरज की मद्धम


हरी पत्तियाँ क्यों मनाएँगी मातम

ये गिरने से पहले सुनायेंगी सरगम


है जादू पहाड़ों की ताज़ा हवा का

कि मीलों चलें फिर भी घुटता नहीं दम


कभी धूप आये कभी छाये कोहरा

ये मौसम कहीं ख़ुश्क है तो कहीं नम


जो बादल अभी सुस्त से दिख रहे हैं

ये सब जनवरी में दिखाएंगे दम खम


बहाना मिले आप मिलने जो आएं

मेरी आजकल चाय होती है कुछ कम


निकलते नहीं दिन ढले आप बाहर

सो छत पर नहीं दिख रहे शाम को हम


हिमाचल में हूँ इस बरस इत्तफाकन

यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम


अभी वक़्त है बर्फ़ गिरने में थोड़ा

यहाँ जल्द होगा सफेदी का परचम


नकुल गौतम

Saturday, 30 October 2021

हज़ल

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हज़ल



तेरे दीदार से दिल में अगर हलचल नहीं होती

तो शायद ब्याह कर के ज़िंदगी दंगल नहीं होती


मेरी ज़ुल्फ़ें यकीनन आज भी सलमान सी होतीं

तुम्हारे पास गर कोल्हापुरी चप्पल नहीं होती


मैं कितनी बार पिटने से बचा हूँ, शुक्र है इनका

बताओ क्या हुआ होता जो ये पायल नहीं होती


मेरी ये ज़िन्दगी शायद हुआ करती ज़रा रंगीन

अगर उस दिन पड़ोसन आँख से ओझल नहीं होती


उसे देखूँ मैं जब भी इश्क़ के दौरे से उठते हैं

वो मुझ से इश्क़ कर लेती अगर पागल नहीं होती


मुहब्बत भी पड़ोसी से ही की ऐ आलसी औरत

मुहब्बत में ज़रा चलती तो यूँ क्विंटल नहीं होती


अगर तुम वक़्त रहते वज़्न कुछ कंट्रोल कर लेतीं

तो यूँ दब कर तुम्हारी एक्टिवा घायल नहीं होती



अगर पिछले महीने ही नहा लेता मैं जानेजां

तो अब भी शहर की पानी की दिक्कत हल नहीं होती



मेरी ये शायरी जानम तुम्हारी ही बदौलत है

अगर तुम पढ़ लिया करतीं तो यूँ चंचल नहीं होती

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