Wednesday, 21 September 2016

ज़िक्र होता है मगर अक्सर तेरा


अब मेरे दिल में नहीं है घर तेरा
ज़िक्र होता है मगर अक्सर तेरा

हाँ! ये माना है मुनासिब डर तेरा
आदतन नाम आ गया लब पर तेरा

भूल तो जाऊँ तुझे पर क्या करूँ
उँगलियों को याद है नम्बर तेरा

कर गया ज़ाहिर तेरी मजबूरियां
टाल देना बात यूँ हँस कर तेरा

शुक्र है! आया है पतझड़ लौट कर
बाग़ से दिखने लगा फिर घर तेरा

वो मुलाक़ात आख़िरी क्या खूब थी
भूल जाना लाश में खंजर तेरा

कोई बतलाये अगर मैं हूँ किधर
तब तो शायद बन सकूँ रहबर तेरा

हैं क़लम की भी तो कुछ मजबूरियाँ
थक गया हूँ नाम लिख लिख कर तेरा

बावरेपन की 'नकुल' अब हद हुई
इश्क़ उसको? वो भी मुझसे ? सर तेरा!

Monday, 15 August 2016

हिचकियों ने कल सताया देर तक


ज़ुल्म मुझ पर उसने ढाया देर तक
हिचकियों ने कल सताया देर तक

बाग़ में ताज़ा कली को देख कर
एक भँवरा गुनगुनाया देर तक

कल अमावस हो गयी पूनम हुज़ूर
चाँद छत पर मुस्कुराया देर तक

मोर ने अंगड़ाइयाँ जब खुल के लीं
मेघ ने मल्हार गाया देर तक

कल तेरी तसवीर से बातें हुईं
हालेदिल मैंने सुनाया देर तक

ख़्वाब में भी कल वो आये देर से
सब्र मेरा आज़माया देर तक

याद रखने की हिदायत दे गया
लौट कर जो ख़ुद न आया देर तक

Saturday, 11 June 2016

तेरी हाँ में हाँ न मिला सका

1 दिसम्बर 2016 के दैनिक जागरण के अभिनव पृष्ठ पर मेरी इस ग़ज़ल को स्थान मिला। आदरणीय नवनीत जी की मुहब्बत मिली तो मेरी यह कोशिश सफ़ल हुई


न तो झूट मैंने कहा कभी न ही सच का साथ निभा सका
मेरी हार का है सबब कि मैं तेरी हाँ में हाँ न मिला सका

मैं था जिसका अरसे से मुन्तज़िर वो मिला हो जैसे इक अजनबी
न तो बात उस से हुई कोई न गले उसे मैं लगा सका

कभी पढ़ के इन को मैं रो लिया कभी रख के सीने पे सो लिया
न ये चिट्ठियां मैं जला सका न किसी नदी में बहा सका

न बयान उन से हुआ कभी न ही दर्द दिल का छिपा कभी
न रुमाल उन को दिखा सका न ही अश्क उन से छिपा सका

थी बनाई मैंने भी कश्तियां तेरे साथ जीने के ख्वाब की
जो बढ़ा गयीं मेरी तिश्नगी मैं वो बारिशें न भुला सका

ये हरे शजर हों कि बदलियाँ वो नदी वो बर्फ पहाड़ पर
हैं तुम्हारी लिक्खी इबारतें कोई पढ़ सका न मिटा सका

Tuesday, 1 March 2016

इज़्तिराबी अज़ाब की सी है


लफ्ज़ पोर्टल की 28वीं तरही में मेरी कोशिश हज़रते मीर तक़ी 'मीर' के मिसरे पर


इज़्तिराबी अज़ाब की सी है
उन से दूरी सराब की सी है

शायरी बिन तेरे तस्सव्वुर के
ख़ाली बोतल शराब की सी है

लब झिझकते हैं उसको छूने में
“पंखुड़ी इक ग़ुलाब की सी है”

सादगी से सजी तेरी सूरत
इक ग़ज़ल की किताब की सी है

ज़िन्दगी में कमी है लम्हों की
डायरी घर-हिसाब की सी है

उस इमारत की नींव में पीपल
इब्तिदा इंक़लाब की सी है

सिर्फ़ दीदार से नहीं भरता
दिल की फ़ितरत नवाब की सी है

Wednesday, 10 February 2016

हज़ल


हज़ल

सरे राह बारिश में छाता उड़ा कर तेरा भीग जाना गज़ब हो गया
जो होली के दिन भी नहीं थी नहाती तेरा कल नहाना गज़ब हो गया

तेरे सुर्ख़ होंठों पे ये मुस्कुराहट, नज़रबट्टुओं की हो जैसे बनावट
लहू पी के आई हो जैसे कहीं से, तेरा पान खाना गज़ब हो गया

खुली ज़ुल्फ़ है या हैं काली घटायें, जुओं का क़बीला तुझे दे दुआयें
ऐ मेरे मोहल्ले की सन्नी लियोनी, तेरा सर खुजाना गज़ब हो गया

वही क़ाफ़िये हैं वही ज़ाविये हैं, ज़मीनें हमारी क़िले आपके हैं
हमारी ग़ज़ल ही का मक़्ता बदल के हमीं को सुनाना गज़ब हो गया

मुहब्बत की बारिश का कैसा असर है, जिसे भी मैं देखूँ वही तर-ब-तर है
बुढ़ापे की दहलीज़ पर ऐसे-ऐसे मेरा गुल खिलाना गज़ब हो गया

Friday, 25 December 2015

छिपाके यार तबस्सुम में बेक़रारी रख


लफ्ज़ पोर्टल की 27वीं तरही में एक प्रयास


ऐ दिल हमारे बस इक इल्तिजा हमारी रख
ये राज़ राज़ रहे थोड़ी होशियारी रख

इन आसुंओं पे लगा बाँध टूट जाने दे
बहा दे बोझ ऐ दिल! यूँ न ख़ुद को भारी रख

ज़रा तो सब्र से ले काम चाँद आने तक
“छिपाके यार तबस्सुम में बेक़रारी रख”

तिरे लिये ही तो आया हूँ मयकदे में फिर
दिले-मरीज़ मेरी लाज अब की बारी रख

‘नहीं-नहीं’ वो लिखें गर तो हाँ समझ लेना
हिसाब में ये मुहब्बत के जानकारी रख

ये राह आम नहीं है गली मुहब्बत की
ज़रा संभाल के ये उम्र की सवारी रख

कुछ एक पल की मुलाकात में धड़कना क्या?
तबाह दिल मेरे इतनी तो इन्किसारी रख

ये फूल चीड़* के जंगल में अब नहीं मिलते
‘नकुल’ सँभाल के बचपन की याद प्यारी रख

Sunday, 30 August 2015

झरने का साज़ जैसे घटा में लगा रहा


लफ्ज़ पोर्टल की 25वीं तरही में मेरी कोशिश


झरने का साज़ जैसे घटा में लगा रहा
पर्दे में चाँद शर्मो-हया में लगा रहा

मालूम था मुझे कि मुहब्बत क़ुसूर है
दिल फिर भी इस हसीन ख़ता में लगा रहा

सुनता रहा जो उसकी कहानी मैं रात भर
अपने अकेलेपन की दवा में लगा रहा

शब भर सता रहा था धुंआ कल सिगार का
सूरत बनाने तेरी हवा में लगा रहा

फुटपाथ सो गया था सजा कर थकावटें
बिस्तर पे बंग्ला डेढ़-सवा में लगा रहा

रस्ते में जो मिला था उसे अपना मान कर
मिट्टी का इक खिलौना, अना में लगा रहा

खेतों में फिर से काकभगोड़े उदास हैं
मौसम बदल बदल के जफ़ा में लगा रहा

नाराज़ मौसमों को बुलाता रहा किसान
‘मैं उस के साथ साथ दुआ में लगा रहा’

मैं खींचता इसे, ये कभी खींचता मुझे
रिक्शा सा ज़िन्दगी का ख़ला में लगा रहा