Wednesday, 10 February 2016

हज़ल


हज़ल

सरे राह बारिश में छाता उड़ा कर तेरा भीग जाना गज़ब हो गया
जो होली के दिन भी नहीं थी नहाती तेरा कल नहाना गज़ब हो गया

तेरे सुर्ख़ होंठों पे ये मुस्कुराहट, नज़रबट्टुओं की हो जैसे बनावट
लहू पी के आई हो जैसे कहीं से, तेरा पान खाना गज़ब हो गया

खुली ज़ुल्फ़ है या हैं काली घटायें, जुओं का क़बीला तुझे दे दुआयें
ऐ मेरे मोहल्ले की सन्नी लियोनी, तेरा सर खुजाना गज़ब हो गया

वही क़ाफ़िये हैं वही ज़ाविये हैं, ज़मीनें हमारी क़िले आपके हैं
हमारी ग़ज़ल ही का मक़्ता बदल के हमीं को सुनाना गज़ब हो गया

मुहब्बत की बारिश का कैसा असर है, जिसे भी मैं देखूँ वही तर-ब-तर है
बुढ़ापे की दहलीज़ पर ऐसे-ऐसे मेरा गुल खिलाना गज़ब हो गया

Friday, 25 December 2015

छिपाके यार तबस्सुम में बेक़रारी रख


लफ्ज़ पोर्टल की 27वीं तरही में एक प्रयास


ऐ दिल हमारे बस इक इल्तिजा हमारी रख
ये राज़ राज़ रहे थोड़ी होशियारी रख

इन आसुंओं पे लगा बाँध टूट जाने दे
बहा दे बोझ ऐ दिल! यूँ न ख़ुद को भारी रख

ज़रा तो सब्र से ले काम चाँद आने तक
“छिपाके यार तबस्सुम में बेक़रारी रख”

तिरे लिये ही तो आया हूँ मयकदे में फिर
दिले-मरीज़ मेरी लाज अब की बारी रख

‘नहीं-नहीं’ वो लिखें गर तो हाँ समझ लेना
हिसाब में ये मुहब्बत के जानकारी रख

ये राह आम नहीं है गली मुहब्बत की
ज़रा संभाल के ये उम्र की सवारी रख

कुछ एक पल की मुलाकात में धड़कना क्या?
तबाह दिल मेरे इतनी तो इन्किसारी रख

ये फूल चीड़* के जंगल में अब नहीं मिलते
‘नकुल’ सँभाल के बचपन की याद प्यारी रख

Sunday, 30 August 2015

झरने का साज़ जैसे घटा में लगा रहा


लफ्ज़ पोर्टल की 25वीं तरही में मेरी कोशिश


झरने का साज़ जैसे घटा में लगा रहा
पर्दे में चाँद शर्मो-हया में लगा रहा

मालूम था मुझे कि मुहब्बत क़ुसूर है
दिल फिर भी इस हसीन ख़ता में लगा रहा

सुनता रहा जो उसकी कहानी मैं रात भर
अपने अकेलेपन की दवा में लगा रहा

शब भर सता रहा था धुंआ कल सिगार का
सूरत बनाने तेरी हवा में लगा रहा

फुटपाथ सो गया था सजा कर थकावटें
बिस्तर पे बंग्ला डेढ़-सवा में लगा रहा

रस्ते में जो मिला था उसे अपना मान कर
मिट्टी का इक खिलौना, अना में लगा रहा

खेतों में फिर से काकभगोड़े उदास हैं
मौसम बदल बदल के जफ़ा में लगा रहा

नाराज़ मौसमों को बुलाता रहा किसान
‘मैं उस के साथ साथ दुआ में लगा रहा’

मैं खींचता इसे, ये कभी खींचता मुझे
रिक्शा सा ज़िन्दगी का ख़ला में लगा रहा

Saturday, 4 July 2015

मुक़ाबले में फिर से हार हो गयी पगार की


लफ्ज़ पोर्टल की २४वीं तरही में मेरी कोशिश


मुक़ाबले में फिर से हार हो गयी पगार की
दिहाड़ियां ग़ुलाम हो के रह गयीं उधार की

जवान उस ग़रीब की हुई हैं जब से बेटियां
पड़ी है भारी ‘सौ लुहार की’ पे ‘इक सुनार की’

उस ऊंघती गली में दफ़अतन वो उनसे सामना
“ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

सज़ा में है मिली हमें ये बेवफ़ाई दोस्तो
ख़ता वफ़ा की आदतन जो हमने बार-बार की

दुआ-सलाम, हाल-चाल पूछना तो छोड़िये,
अब उनकी इक झलक भी बात है कभी-कभार की

पहाड़ छोड़ कर ज़ुबान शह्र की तो हो गयी,
है रूह में महक मगर अभी भी देवदार की

इमारतों के मौसमों में बाग़बाँ भी क्या करे?
लगा रहा है बेबसी में क़ीमतें बहार की

घड़ी भी थक के रुक चुकी है, राह भी है सो गयी
कटेगी कैसे अब ‘नकुल’ घड़ी ये इंतज़ार की

Saturday, 25 April 2015

ये ज़ख्मे दिल है इसकी दवाई हुई तो है


लफ्ज़ पोर्टल की 23वीं तरही में मेरी एक कोशिश

ग़ज़ल...

बंजर पड़ी ज़मीं की नपाई हुई तो है
उम्मीद काग़ज़ों ने बढ़ाई हुई तो है

फिर से मुआवज़े की कहीं घोषणा हुई
अफवाह फिर किसी ने उड़ाई हुई तो है

नारे चुनाव के वो दीवारों पे लिख गए
बस्ती में इस बहाने पुताई हुई तो है

हम भी हुए थे भीड़ में शामिल चुनाव की,
भर पेट खा लिया है कमाई हुई तो है

राई का जो पहाड़ बनाते थे मिल के रोज़
आख़िर उन आईनों की सफाई हुई तो है

अच्छा अगर बहुत हो तो होता है कुछ बुरा,
दिल्ली ने “आप” बीती सुनाई हुई तो है

दो खेत बेच कर है मिला फ्लैट शहर में
छत चू रही? है देखो चिनाई हुई तो है

बादल घिरे हुए हैं कि जंगल में आग है
काली घटा पहाड़ पे छाई हुई तो है

सूखे के बाद बाढ़ में डूबी हुई फ़सल
कीमत विकास की ये चुकाई हुई तो है

मौसम की करवटों से उठा है यही सवाल
कुदरत की वाट हमने लगाई हुई तो है

उस बाँध में डूबा है मेरा खेत भी कहीं
बिजली ये शहर की भी चुराई हुई तो है

फिर से नयी हुई है, रफ़ूगर! क़माल है
ऐसे क़मीज़ पर ये कढ़ाई हुई तो है

मैं शायरी में भूल गया हूँ इसे 'नकुल'
“ये ज़ख्मे दिल है इसकी दवाई हुई तो है”

Tuesday, 17 March 2015

ख़ुदा मेरी क़लम को दूर ही रखना सियासत से


खुशामद में महारत से, उसूलों की तिजारत से
ख़ुदा मेरी क़लम को दूर ही रखना सियासत से

यहाँ मुजरिम भी मैं ही हूँ, है मेरी ही गवाही भी,
कहाँ मैं भाग कर जाऊं, अब इस दिल की अदालत से

तिरे बन्दों का कद मुझको नहीं दिखता है इक जैसा,
ख़ुदा क्या फायदा तेरे जहां की इस शबाहत से

चलाना ज़ोर फूलों पर बहुत आसान है साहिब
मैं डाली ख़ार वाली हूँ मुझे पकड़ो नफासत से

ये मेरे गाँव की मिट्टी से मुझको दूर करती है
मिरा दिल भर गया है नौकरी से, इस लियाक़त से

ये माना काबिले तारीफ़ हैं हर शोख़िया उनकी
दुखा दे दिल किसी का फ़ासिला हो उस शरारत से

न जाने क्यों वो सस्ते दाम पर बिकते हैं कमरों में
नहीं जो मंच पर थकते उसूलों की वक़ालत से

पारिन्दा शाम को फिर से क़फ़स में लौट आया है
न जाने कौन सा रिश्ता निभाता है हिरासत से

Saturday, 7 March 2015

मैं दाल मखानी में घी थोड़ा मिला दूँ तो



आदरणीय पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर होली की तरही में मेरी कोशिश

नानी की रसोई की फिर याद करा दूँ तो
मैं दाल मखानी में घी थोड़ा मिला दूँ तो

फ़ाल्गुन का महीना है, होली का बहाना है
तू भूल ग़िले सारे, शिकवे मैं भुला दूँ तो

यह भांग भी होली पर झूमेंगी नशे में धुत,
ले नाम तिरा इसमें , जल थोड़ा मिला दूँ तो

कैसे हैं ये रासायन, चमड़ी ही जला डालें,
चल छोड़ गुलालों को, जल पान करा दूँ तो?

बगिया की महक तुझको फीकी न लगे कहना ,
गर बादे-सबा तुझको , घर उनका दिखा दूँ तो

चांदी की मिरी ज़ुल्फ़ें चमकेंगी घटा बन कर,
गर ग्रीस ज़रा सी मैं बालों पे लगा दू तो

ग़ज़लें ये मिरी शायद , फूलों सी महक जाएँ ,
इनको मैं अगर तेरी यादों से सजा दूँ तो